महासागर मंथन एक बहुत विस्तृत प्रक्रिया थी| मंद्रांचल पर्वत को मथनी बनाया गया और वासुकी (नागों के राजा) को मंथन की रस्सी बनाया गया | देवताओ ने साँप की पूँछ पकड़ी जबकि राक्षसों ने सांप का सीर पकड़ा| उन्होंने पर्वत को सांप की सहायता से घुमाया जिस से समुद्र मंथन हुआ| हालांकि एक बार पर्वत सरकने लगा जिस से मंथन मैं बाधा उत्पन्न हुई तब विष्णु के दूसरे अवतार कुरमा कछुआ के रूप मैं आगे आया और पर्वत को अपनी पीठ पर सहारा दिया जिस से मंथन आगे हो सका|
ये कथा सुनने मैं जिसनी आसान लगती है असल मैं उतनी सरल है नहीं|
कुम्भ का मेला इसी उपलक्ष्य मैं मनाया जाता है|
कुम्भ का मतलब यहाँ मानव शरीर से है और ये मानव शरीर के मंथन करने का तरीका बताता है|
इंसान के मन मैं देव और राक्षसी दोनों तत्त्व होते हैं जिसकी सहायता से ही ये मंथन संभव है| इस कथा मैं कछुआ का मतलब कितने अच्छे तरीके से समझाया गया| कछुआ एक ऐसा जीव है जो अपने अंदर समा जाता है|
इसका मतलब ये है की अगर आपको आत्मा मंथन करना है तो आपको कछुए की तरह अपने अंदर जाना है तभी आपको उस मंथन के लिए ज़रुरी पर्वत को संभालने का बल प्राप्त होगा और तभी आपको उस मंथन से निकलने वाली चीजों का लाभ ले सकते हो|
समुद्र मंथन के दौरान पहले तत्त्व विष (जहर) निकला था जिसे शिव जी ने अपने गले मैं धारण किया था|
इसका मतलब बिलकुल साफ़ समझ मैं आता है| जब आप ध्यान (meditation) करते हो और उस ध्यान मैं आगे बढते हो तब आपके शरीर मैं दर्द होना शुरू हो जाता है| ये ध्यान की स्वाभाविक प्रक्रिया है और उस दर्द को दूर करने के लिए आपको किसी दवाई की ज़रूरत नहीं है| जैसे जैसे आप ध्यान मैं आगे बढते हो आपका शारीरिक दर्द अपने आप चला जाता है| जब ऐसा हो जाए तो समझना चाहिए की आप सही दिशा मैं चल रहे हैं और आपने पहला पड़ाव जो विष को दर्शाता है वो पार कर लिया है|
यहाँ शिव जी का जो मतलब हा वो उनके गुणों से है| शिव जी को गुस्सा बहुत कम आता है, वो सबको एक समान देखते है चाहे वो देवता हो या राक्षस, शिव जी के और भी कई गुण हैं|
इसका मतलब ये है की जब आप आत्मा मंथन के पहले पड़ाव मैं हो तोह आपको शिव जी की तरह आचरण करना है| तब आपका वो दर्द अपने आप कम हो जायेगा|
यहाँ सब चीज़ का मतलब अच्छे आचरण से है| अगर आपका मन साफ़ होगा तब आप अपने आत्म मंथन मैं आसानी से आगे बढोगे वरना आगे बढ़ना मुश्किल होगा|
आगे जो चीज़े समुद्र मंथन मैं निकली थी वो आपको आपके आत्म मंथन से प्राप्त होंगी| इन चीजों का ज्यादा मतलब भौतिक पदार्थो से नहीं वरन आध्यात्मिक है|
इस आत्मा मंथन (कुम्भ) से जो चीज़े निकली थी वि इस प्रकार है|
लक्ष्मी जी
कौस्तुभ – दुनिया का सबसे कीमती गहना|
पारिजात – एक फूल का वृक्ष जो कभी मरता नहीं
वारुणी – देवता जो शराब का मालिक है, या शराब बनाता है|
धनवंतरी - एक चिकित्सक(doctor)
चंद्र – चाँद
कामधेनु – इच्छा पूरी करने वाली गाय
कल्पवृक्ष – इच्छा पूरी करने वाला पेड़
ऐरावत – इन्द्र का हाथी
अप्सरा – रम्भा मेनका आदि (ये सब मन की अप्सरा है जो मन भटकती हैं)
उछैश्र्वास – सात सर वाला घोडा
शृंगा – विष्णु का धनुष
शंख – विष्णु का शंख
अमृत – अमर करने वाला अमृत
ये कथा आगे भी है को बताती है की आत्मा मंथन मैं क्या क्या बाधा आती हैं और उनसे कैसे बचा जा सकता है|
कुम्भ सिर्फ एक मेला नहीं कुम्भ की कथा का मकसद मानव उत्थान से है| किस तरह ध्यान के माध्यम से वो स्वयं को जान सकता है की वो कौन है|
हमारे ग्रन्थ पुराण शास्त्र सब मैं इतना ज्ञान भरा पड़ा है जिससे आज तक जाना ही नहीं गया| हम उन्हें पढ़ कर सिर्फ अन्धविश्वास मैं पड़ जाते हैं और उसका असली महत्व नहीं समझ पाते| और अन्धविश्वास को आप कितनी भी लगन से करो उस से आपको कुछ हासिल नहीं होगा क्यूंकि वो सच नहीं है और हमारा समाज इस तरह के ढोंग से इतना लिप्त हो चूका है की किसी को सोचने का मौका ही नहीं देता की क्या सही है और क्या गलत|
अब ये ज़िम्मेदारी आज के नौजवानों पर है की अपने ग्रंथो को खोलो और उनसे सच बाहर निकालो जिस से हमें वो सब ज्ञान फिरसे मिल सके जो हमारे पूर्वज हमारे लिए छोड गए हैं और उम्मीद करके गए हैं की हम उससे समझ कर उसे और आगे बढ़ाएंगे|
(SUDEEP KUMAR RANA)
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